
एआई और रोबोटिक्स के युग में ‘दिल से इलाज’ की जरूरत
नई दिल्ली: देश के स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने नई पीढ़ी के डॉक्टरों से आह्वान किया है कि वे चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ती तकनीकी प्रगति के साथ-साथ करुणा और मानवता को भी बनाए रखें। उन्होंने कहा, “तकनीकी प्रगति में मानवीय करुणा का महत्व सबसे ज्यादा है, क्योंकि मशीनें इलाज कर सकती हैं, लेकिन इंसान ही दिल से उपचार करता है।”
दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के 50वें दीक्षांत समारोह में बोलते हुए नड्डा ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स जैसी तकनीकें क्रांतिकारी बदलाव ला रही हैं, लेकिन इन सबके बावजूद “हीलिंग के पीछे की इंसानियत कभी नहीं मिटनी चाहिए।”
उन्होंने 326 छात्रों को दीक्षांत समारोह में डिग्री प्राप्त करने पर बधाई दी और कहा कि यह उपलब्धि केवल छात्रों की नहीं, बल्कि उनके शिक्षकों, परिवार और पूरे समाज के सहयोग से संभव हुई है।
तकनीकी प्रगति और मानवीय संवेदना का संतुलन
नड्डा ने कहा कि तकनीक ने रोग पहचानने की गति और सटीकता में अद्भुत सुधार किया है। लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि “मानव स्पर्श और सहानुभूति की भावना ही वास्तविक उपचार को सार्थक बनाती है।”
उन्होंने बताया कि एआईआईएमएस अब देश में एआई आधारित डायग्नोस्टिक्स, रोबोटिक सर्जरी और जीनोमिक्स के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यहां पर ड्यूल किडनी और रीनल ऑटो-ट्रांसप्लांट जैसी आधुनिक प्रक्रियाएं अब आम हो चुकी हैं।
नड्डा ने यह भी बताया कि संस्थान वर्तमान में 900 से अधिक शोध परियोजनाओं पर काम कर रहा है और ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ अभियान के तहत स्वच्छता रैंकिंग में भी शीर्ष स्थान बनाए हुए है।

भारत में चिकित्सा शिक्षा का स्वर्ण युग
स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि आज भारत में 23 एम्स हैं, जिनमें से 20 पूरी तरह संचालित हैं। पिछले दशक में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 819 हो चुकी है। इसी तरह एमबीबीएस सीटें 51,000 से बढ़कर 1.29 लाख और पीजी सीटें 31,000 से बढ़कर 78,000 हो गई हैं।
उन्होंने कहा, “अगले पांच वर्षों में हम 75,000 नई सीटें जोड़ने की योजना बना रहे हैं।”
नड्डा ने यह भी बताया कि मातृ और शिशु मृत्यु दर में भारत की प्रगति वैश्विक औसत से तेज है। ‘द लैंसेट’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि “अब 90% कैंसर रोगियों को 30 दिनों के भीतर उपचार मिल रहा है, जो आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं की सफलता का प्रमाण है।”
कोविड से लेकर वैक्सीन तक: भारत की मिसाल
कोविड महामारी को याद करते हुए नड्डा ने कहा, “भारत ने पहली कोविड केस के नौ महीने के भीतर दो स्वदेशी वैक्सीन विकसित कीं और 220 करोड़ से अधिक टीके लगाकर दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाया।”
कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर वी. के. पॉल ने भी डॉक्टरों से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “हमारा कर्तव्य केवल इलाज करना नहीं, बल्कि उस समाज को भी वापस देना है जिसने हमें यहां तक पहुंचाया।”
उन्होंने युवाओं को शिक्षण और शोध के क्षेत्र में आगे आने की सलाह दी ताकि भारत ‘विकसित भारत’ के विजन की ओर तेजी से बढ़ सके।
“तकनीक सिखाती है इलाज, लेकिन करुणा सिखाती है उपचार”
नड्डा ने डॉक्टरों को याद दिलाया कि “एक एमबीबीएस छात्र की ट्रेनिंग पर लगभग 1.5 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जो समाज वहन करता है। इसलिए यह हर डॉक्टर की जिम्मेदारी है कि वह समाज की सेवा ईमानदारी और मानवता के साथ करे।”
उन्होंने कहा, “तकनीकी प्रगति में मानवीय करुणा का महत्व हमें यह सिखाता है कि मशीनें निदान कर सकती हैं, लेकिन इंसान ही दिल से इलाज कर सकता है।”
समारोह के अंत में उन्होंने कहा, “एम्स केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय ब्रांड है। आप सभी इसके राजदूत हैं — इसकी पहचान उत्कृष्टता और करुणा है, इसे बनाए रखना आपका कर्तव्य है।”
निष्कर्ष
आज जब दुनिया तेजी से डिजिटल और तकनीकी होती जा रही है, तब भी इंसानियत और करुणा की जरूरत कम नहीं हुई है। डॉक्टर केवल शरीर नहीं, बल्कि आत्मा को भी ठीक करते हैं — और यही भाव ‘विकसित भारत’ के निर्माण की सच्ची नींव है।
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